बच्चपन, झांकना तुम अब बंद करो…
कुछ लोगों को लगता है बच्चपन को साथ रखकर बड़े नहीं हो सकते हैं मगर बच्चपन साथ नहीं तो बड़े होने मैं कोई मज़ा नहीं है!
वो झाँक रहा इधर-उधर से
ख़ामोशी को अपनाया था
मेरी नज़र पड़ी अचानक जो
तो मंद मंद मुस्कुराया था
कहाँ हो कुछ खबर नहीं है
हमको तुम क्यों ऐसे तरसाते हो
हम जो मिलने आये नहीं तो
तुम सालों तक छुप जाते हो
कभी कहीं धोके से हम टकराते ज़रूर हैं
सलाम-दुआ कर हम आगे बढ़ जाते हैं
क्या इतना वक़्त गुज़र गया की हाथ नहीं तुम आते हो
मैं रहना चाहता था, हमेशा साथ तुम्हारे
मगर तुम कहानियों के जिन्न जैसे सामने आ जाते हो
वो आँगन, पेड़-पौधे, शरारते, गुड्डे गुडियें बाशिंदे थे बच्चपन के
न तुम अब रहते हो इस शहर में न मिलते हो बाशिंदों से
कुछ लम्हे फुर्सत के और सुकून के साये में
हम कभी तो मिलें और जी लें वो लम्हे बच्चपन में
जहाँ सही ग़लत की सोच बोझ न बनती थी कन्धों पर
बहोत कुछ न रहा और न रह पायेगा आगे भी
जो बीत गया सो बीत गया न सेह पायेगा ये बच्चपन भी
जीना है तो बैठों थोड़ी देर सही
याद करो क्या करते थे बिना सोचे सिर्फ खुश रहने को
जो पल बीता है और जो बीतने वाला है
बना लो उस को अपना ख़ास हिस्सा कल आज और कल में भी
जो सिर्फ एक चीज़ करना है दोस्त
रुख करना अपने बच्चपन की तरफ कई दफा
वो सोच से कागज़ की कश्ती सफर तै कराती थी
जो लकड़ी के घोड़े पर सैर करते थे हज़ारों-मीलों की
वो गुब्बारा, गुड्डे-गुड़ियें, कागज़ के रौकेट शरारतों से भरी जेबें
दोस्तों का साथ और वक़्त को न समझने का हुनर — गहरा करता था बच्चपन का रंग
उम्र न बढ़ना हाथ में नहीं हमारे है
जो याद रखना है, रख सकते है, जी हाँ गिरिफ्त में यह हमारे है
बच्चपन वो आँगन है जहाँ लौटकर जाने में
खुशियों के ही ख़ज़ाने है
कभी-कभी अपने खाली वक़्त में रुख कर लेना बच्चपन का
मिलते रहने से ही उससे ज़िन्दगी हमेशा रंगीन है
वादा है मेरा तुमसे, ऐ बच्चपन, मिलते रहेंगे अब हम दोनों हमेशा,
सुनो, बच्चपन, झांकना तुम अब बंद करो